करवा चौथ व्रत पौराणिक कथाएं 
October 17, 2019 • RAJESH SRIVASTAVA

करवा चौथ व्रत पौराणिक कथाएं 

गणेश चतुर्थी करवा कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष में गणेश चतुर्थी का पर्व मनाया जाता है, जिसको स्त्रियां अपने पति की लंबी आयु के लिए दिन भर व्रत रखकर गणेश भगवान की पूजा करती है रात्रि में चंद्रमा को देखकर फल, फूल, मिष्ठान, पकवान आदि अर्पित कर चन्द्रमा को अर्घ्य देती हैं और चंद्र देव से अपने पति की लम्बी आयु के लिए प्रार्थना करती है। पूजन के पश्चात स्त्रियां अपने पति का चेहरा देखकर प्रणाम करके आशीर्वाद लेने के बाद अन्न जल गृहण करती है। 
 
मान्यता है कि सर्वप्रथम करवा चौथ का व्रत शक्ति स्वरूपा माता पार्वती जी ने अपने अखंड सौभाग्य के लिए किया था। कथा के अनुसार एक बार देवताओं और राक्षसों के मध्य भयंकर युद्ध चल रहा था अनेक उपायों के बाद भी देवताओं को सफलता नहीं मिल पा रही थी। तब ब्रह्मदेव ने सभी देवताओं की पत्नियों को कार्तिक माह की चतुर्थी के दिन करवा चौथ का व्रत करने को कहा था। जिसको करने के बाद देवताओ की विजय हुई थी। इसके बाद से ही कार्तिक माह की चतुर्थी के दिन करवा चौथ का व्रत रखने की परंपरा शुरू हुई और स्त्रियाँ अपने पति की विजय और लम्बी आयु के लिए करवा चौथ का व्रत करने लगी।
 
वही अन्य पौराणिक कथा के अनुसार काफी समय पूर्व इन्द्रप्रस्थपुर नाम के शहर में एक ब्राह्मण और उसकी पत्नी रहते थे। उसके सात पुत्र और एक गुणवान पुत्री थी। पुत्री का नाम वीरावती था जब वह विवाह के लायक हो गयी तब उसकी शादी एक उचित ब्राह्मण युवक से हुई। शादी के बाद वीरावती अपने माता-पिता के यहाँ  अपनी भाभियों के साथ पति की लम्बी आयु के लिए करवा चौथ का व्रत रखा। व्रत के दौरान वीरावती को भूख सहन नहीं हुई वह मूर्छित होकर जमीन पर गिर गई। उसके भाई जानते थे वीरावती एक पतिव्रता नारी है और वो चन्द्रमा के दर्शन किये बिना अन्न जल ग्रहण नहीं करेगी। उसके भाईयों ने मिलकर योजना बनायी और कुछ दूर वट के वृक्ष पर हाथ में छलनी और दीपक लेकर चढ़ गए। इस दौरान भाइयो ने वीरावती से कहा कि चन्द्रोदय हो गया है। वीरावती ने कुछ दूर वट के वृक्ष पर छलनी के पीछे दीपक को देख विश्वास कर लिया कि चन्द्रमा वृक्ष के पीछे निकल आया है। वीरावती ने व्याकुलता में शीघ्र ही दीपक को चन्द्रमा समझ अर्घ अर्पण कर पूजन अर्चन किया और अपने व्रत को तोड़ा। वीरावती ने जब भोजन करना प्रारम्भ किया तो उसे अशुभ संकेत मिलने लगे और जब वह अपने ससुराल पहुँची तो अपने पति के मृत शरीर को पाया। मृत शरीर देखकर वीरावती रोने लगी और करवा चौथ के व्रत के दौरान अपनी किसी भूल के लिए विलाप करने लगी। इस दौरान इन्द्र देवता की पत्नी देवी इन्द्राणी वीरावती को सान्त्वना देने के लिए पहुँची और बताया कि उसने चन्द्रमा को अर्घ अर्पण किये बिना ही व्रत तोड़ लिया था जिससे उसके पति की असामयिक मृत्यु हो गई। देवी इन्द्राणी ने वीरावती को करवा चौथ के व्रत के साथ-साथ पूरे साल में हर माह की चौथ को व्रत करने को कहा। वीरावती ने बड़े विश्वास के साथ सभी धार्मिक कृत्यों और मासिक उपवास किया और अन्त में उन सभी व्रतों से मिले पुण्य के कारण वीरावती को उसका पति पुनः प्राप्त हो गया।