वट सावित्री व्रत कथा विधि , वट वृक्ष पूजन महत्व
May 29, 2019 • RAJESH SRIVASTAVA

 

वट सावित्री व्रत विधि कथा और महत्व - आचार्य श्याम जी अग्निहोत्री
                    
 
क्या है वट सावित्री व्रत का महत्व
ज्येष्ठ माह की अमावस्या को वट सावित्री व्रत के पूजन का विधान है। इस दिन महिलाएँ अपने सुखद वैवाहिक जीवन की कामना से वटवृक्ष की पूजा-अर्चना कर व्रत करती हैं। वट सावित्री व्रत में 'वट' और 'सावित्री' दोनों का विशेष महत्व माना गया है।
 
वट / बरगद वृक्ष का महत्व
इस संसार में अनेक प्रकार के वृक्ष है उनमे से बरगद के पेड़ का भी विशेष महत्व है। शास्त्रानुसार 'वट मूले तोपवासा' ऐसा कहा गया है। वट वृक्ष तो दीर्घायु और अमरत्व का प्रतीक है। पुराण के अनुसार बरगद में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों का निवास होता है। मान्यता है कि इस वृक्ष के नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा आदि सुनने से मनोवांक्षित फल की प्राप्ति शीघ्र ही होती है।
 
वट वृक्ष अपनी विशालता तथा दीर्घायु के लिए लोक में प्रसिद्ध होने से सुहागन महिलाएं वटवृक्ष की पूजा अपने पति के दीर्घायु होने की कामना के लिए करती है जिससे वट की तरह ही उनका पति भी दीर्घायु और विशाल बने रहे।
 
वटवृक्ष की अन्य विशेषताए -
मृत्यु के देवता यमराज ने जब सावित्री के पति सत्यवान के प्राण का हरण किये तब सावित्री और यमराज के मध्य शास्त्रार्थ वटवृक्ष के नीचे तीन दिन तक शास्त्रार्थ हुआ था। जिसके बाद प्रसन्न होकर यमराज ने सावित्री के पति को पुनर्जीवित कर दिया था। वही से वट वृक्ष / बरगद का भी संबंध कथा से जुड़ गया और बरगद का महत्त्व बढ़ गया।
 
मान्यता है कि प्रयाग में प्रसिद्ध अक्षय वट के नीचे प्रभु श्रीराम, सीताजी एवं लक्ष्मणजी ने विश्राम किया था। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, नृसिंह, नील एवं माधव का निवास स्थान वटवृक्ष है।
 
वटवृक्ष का सम्बन्ध शिव तथा शनि देव से भी माना जाता है। दोनों ही देव न्याय प्रिय है। 
 
स्कन्दपुराण में कहा गया है - 'अश्वत्थरूपी विष्णु: स्याद्वरूपी शिवो यत:' अर्थात् पीपलरूपी विष्णु व जटारूपी शिव हैं। वटवृक्ष की जड़ों में ब्रह्मा जी, तने में विष्णु और डालियों एवं पत्तों में शिव का वास होता है। इसके नीचे बैठकर पूजन, व्रत कथा कहने और सुनने से मनोकामना पूरी होती है।
 
सावित्री का महत्त्व 
भारतीय संस्कृति में सावित्री नाम का चरित्र लोकविश्रुत है। सावित्री का अर्थ वेद माता गायत्री और सरस्वती भी होता है। सावित्री का जन्म भी विशिष्ट परिस्थितियों में हुआ था। कथा के अनुसार भद्र देश के राजा अश्वपति को कोई भी संतान नहीं न थी। उन्होंने संतान पाने के लिए मंत्रोच्चारण के साथ प्रतिदिन एक लाख आहुतियाँ दीं। अठारह वर्षों तक यह क्रम निरन्तर चलता रहा। इसके बाद सावित्री देवी प्रकट होकर वर दिया कि 'राजन तुझे एक तेजस्वी कन्या की उत्पत्ति होगी।' सावित्री देवी की आशीर्वाद से जन्म लेने के कारण कन्या का नाम सावित्री रखा गया।
कन्या बहुत ही बुद्धिमान तथा रूपवान थी। उनके लिए योग्य वर न मिलने की वजह से सावित्री के पिता दुःखी रहते थे। उन्होंने कन्या को स्वयं वर तलाशने भेजा। सावित्री तपोवन में भटकने लगी। वहाँ साल्व देश के राजा द्युमत्सेन रहते थे, क्योंकि उनका राज्य किसी ने छीन लिया था। उनके पुत्र सत्यवान को देखकर सावित्री ने पति के रूप में स्वीकार कर लिया था।साल्व देश पूर्वी राजस्थान या अलवर अंचल के इर्द-गिर्द था। सत्यवान वेद के ज्ञाता थे और अल्पायु थे। जिसके चलते नारद मुनि ने सावित्री को सत्यवान से विवाह न करने की सलाह दी थी, परंतु सावित्री ने सत्यवान से ही विवाह किया। पति की मृत्यु की तिथि में जब कुछ ही दिन शेष रह गए तब सावित्री ने घोर तपस्या की जिसका फल मिला जो हम सभी सत्यवान- सावित्री कथा के रूप में जानते हैं।
 
वट सावित्री व्रत पूजा के अनुसार इस दिन महिलाएँ सुबह स्नान कर नए वस्त्र पहनकर, सोलह श्रृंगार करती हैं। निराहार रहते हुए सुहागिन महिलाएं वट वृक्ष में कच्चा सूत लपेटते हुए परिक्रमा करती हैं। वट पूजा के समय फल, मिठाई, पूरी, पुआ भींगा हुआ चना और पंखा चढ़ाती हैं ।
विशेष रूप में इस पूजन में स्त्रियाँ चौबीस बरगद फल (आटे या गुड़ के) और चौबीस पूरियाँ अपने आँचल में रखकर बारह पूड़ी और बारह बरगद वट वृक्ष में चढ़ा देती हैं। वृक्ष में एक लोटा जल चढ़ाकर हल्दी-रोली लगाकर फल-फूल, धूप-दीप से पूजन करती हैं। कच्चे सूत को हाथ में लेकर वृक्ष की बारह परिक्रमा करती है और हर परिक्रमा पर एक चना वृक्ष में चढ़ाती जाती है और सूत तने पर लपेटती जाती हैं। परिक्रमा के पूरी होने के बाद सत्यवान व सावित्री की कथा सुनती हैं। उसके बाद बारह कच्चे धागा वाली एक माला वृक्ष पर चढ़ाती हैं और एक को अपने गले में डालती हैं। पुनः छः बार माला को वृक्ष से बदलती हैं, बाद में एक माला चढ़ी रहने देती हैं और एक स्वयं पहन लेती हैं। जब पूजा समाप्त हो जाती है तब
पति से आशीर्वाद लेकर व्रत तोड़ती हैं। स्त्रियाँ ग्यारह चने व वृक्ष की बौड़ी (वृक्ष की लाल रंग की कली) तोड़कर जल से निगलती और व्रत तोड़ती हैं।
 
इसके पीछे यह मिथक है कि सत्यवान जब तक मरणावस्था में थे तब तक सावित्री को अपनी कोई सुध नहीं थी लेकिन जैसे ही यमराज ने सत्यवान को जीवित कर दिए तब सावित्री ने अपने पति सत्यवान को जल पिलाकर स्वयं वटवृक्ष की बौंडी खाकर जल ग्रहण की थी।
 
वट सावित्री व्रत कथा
कथा के अनुसार सावित्री ने अपने पति की प्राण रक्षा के लिए निराहार व्रत किया और विष्णु की आराधना करने लगी। जब अमावस्या के दिन सत्यवान का प्राण लेने यमराज आए, लेकिन सावित्री की भक्ति से प्रसन्न होकर सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दे दिया। जब यमराज पति का प्राण लेकर जाने लगे, तो वह पीछे लग गई। आखिरकार यमराज ने प्राण लौटाना पड़ा
 
सावित्री सत्यवान कथा
महाभारत के वनपर्व में सावित्री और सत्यवान की कथा का वर्णन मिलता है। वन में युधिष्ठिर मार्कण्डेय मुनि से पूछते है कि क्या कोई अन्य नारी भी द्रोपदी की जैसे पतिव्रता हुई है जो पैदा तो राजकुल में हुई है पर पतिव्रत धर्म निभाने के लिए जंगल-जंगल भटक रही है। तब मार्कण्डेय मुनि युधिष्ठर से कहते है की पहले भी सावित्री नाम की एक कन्या हुई थी जो इससे भी कठिन पतिव्रत धर्म का पालन कर चुकी है तब युधिष्ठिर मुनि से आग्रह करते है की कृप्या वह कथा मुझे सुनाये —
मुनि कथा सुनाते हुए कहते है —
मद्र देश में अश्वपति नाम का एक बड़ा ही धार्मिक राजा हुआ करता था। जिसकी पुत्री का नाम सावित्री था। सावित्री जब विवाह योग्य हो गई तब महाराज उसके विवाह के लिए बहुत चिंतित थे। महाराज अपनी पुत्री के लिए योग्य वर ढूंढने के लिए बहुत प्रयास किये परन्तु अपनी पुत्री के लिए योग्य वर नहीं ढूंढ सके। तब अन्ततः उन्होंने सावित्री से कहा बेटी अब आप विवाह के योग्य हो गयी है इसलिए स्वयं ही अपने योग्य वर चुनकर उससे विवाह कर लें।तब राजकुमारी शीघ्र ही वर की तलाश में चल दी। तलाश करते करते वह शाल्व देश के राजा के पुत्र सत्यवान जो जंगल में ही पले बढे थे को अपने पति के रूप में स्वीकार की। राजकुमारी अपने देश लौटकर दरबार में पहुंची तो और राजा देवर्षि नारद जी से मंत्रणा कर रहे थे । राजा ने अपनी पुत्री से वर के चुनाव के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि उन्होंने शाल्वदेश के राजा के पुत्र को पति रूप में स्वीकार किया है। जिसका नाम सत्यवान है। तब नारदमुनि बोले राजन ये तो बहुत ही दुःख की बात है क्योंकि इस वर में एक दोष है तत्क्षण राजा ने पूछा भगवन बताये वो कौन सा दोष है ? तब नारदजी ने कहा जो वर सावित्री ने चुना है उसकी आयु बहुत ही कम है। वह सिर्फ एक वर्ष के बाद मरने वाला है। उसके बाद वह अपना देहत्याग देगा। तब सावित्री ने कहा पिताजी कन्यादान एक बार ही किया जाता है जिसे मैंने एक बार वरण कर लिया है। मैं उसी से विवाह करूंगी आप उसे कन्यादान कर दें। उसके बाद सावित्री के द्वारा चुने हुए वर सत्यवान से धुमधाम और पूरे विधि-विधान से विवाह करवा दिया गया।
 
सत्यवान व सावित्री के विवाह के कुछ समय बीत जाने के बाद जिस दिन सत्यवान की मृत्यु होनी थी वह दिन नजदीक आ गया। सावित्री को पता था कि सत्यवान को चौथे दिन मरना है। सावित्री ने तीन दिन पूर्व ही व्रत धारण किया। वह दिन आ गया जिस दिन सत्यवान की मृत्यु होनी थी। सत्यवान जब जंगल में लकड़ी काटने जानेे लगा तब सावित्री भी अपने पति के साथ चलने लगी।
सत्यवान ने सावित्री से कहा कि जंगल का रास्ता कठिन है पर सावित्री नहीं मानी और सत्यवान के साथ जंगल की ओर चल दी ।
 
सत्यवान जब लकड़ी काटने लगा तो अचानक उसकी तबीयत खराब होने लगी। अपने पति की तबियत खराब होते देख सावित्री ने सत्यवान का सिर अपनी गोद में रख लिया और नारदजी की बात स्मरण कर माह दिन व समय का विचार करने लगी। सावित्री को यमराज की एक भयानक आकृति दिखी जिसके हाथ में पाश था।यमराज ने सत्यवान के शरीर में से प्राण निकालकर उसे पाश में बांधकर दक्षिण दिशा की ओर चल दिए। तब सावित्री ने यमराज सेे अपने पति के प्राण न ले जाने की याचना किया और ऐसा न किये जाने पर अपने पति के के प्राण के साथ ही यमराज के साथ चलने को कहा। यमराज ने सावित्री  को समझाया कि सत्यवान का जीवनकाल समाप्त हो चुका है उसके प्राण नहीं लौटाया जा सकता है। यमराज ने सावित्री के पतिव्रता स्त्री होने के कारण खुश होकर मनचाहा वर मांगने को कहा। सावित्री ने यमराज से वर में अपने श्वसुर के आंखे मांग ली। यमराज ने कहा तथास्तु। उसके बाद भी सावित्री यमराज के पीछे चलने लगी। तब यमराज ने उसे पुनःसमझाया और दूसरा वर मांगने को कहा । सावित्री ने दूसरा वर यह मांगा कि मेरे श्वसुर को उनका पूरा राज्य वापस मिल जाए। उसके बाद  भी सावित्री ने साथ चलने की जिद नही छोड़ी। यमराज ने सावित्री से तीसरा वर मांगने को कहा जिस पर सावित्री ने वर मांगा की मेरे पिता जिन्हें कोई पुत्र नहीं हैं उन्हें सौ पुत्र हों। यमराज कहा तथास्तु। पुनः सावित्री उनके पीछे-पीछे चलने लगी यमराज ने कहा सावित्री तुम वापस लौट जाओ , चाहो तो मुझसे कोई और वर मांग लो। तब सावित्री ने कहा मुझे सत्यवान से सौ यशस्वी पुत्र हो। यमराज ने कहा तथास्तु। यमराज फिर सत्यवान के प्राणों को अपने पाश में जकड़े आगे बढऩे लगे। सावित्री ने फिर भी हार नहीं मानी तब यमराज ने कहा तुम वापस लौट जाओ तब सावित्री ने कहा मैं कैसे वापस लौट जाऊं । आपने ही मुझे सत्यवान से सौ यशस्वी पुत्र उत्पन्न करने का आशीर्वाद दिया है। तब यमराज ने सत्यवान के प्राण वापस कर उसे जीवित कर दिया। उसके बाद सावित्री ने अपने पति को पानी पिलाया और आशीर्वाद लेकर पानी पीकर अपना व्रत तोड़ा।